अकाली दल की अंदरूनी स्थिति खराब… फूट के कारण हार की तरफ बढ़ रहा अटवाल का सफर… पार्ट-1

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जालंधर (हरीश शर्मा). अकाली-भाजपा उम्मीदवार के लिए पिछले 20 साल की तरह इस बार भी हालात बढ़िया नजर नहीं आ रहे। हार एक बार फिर दस्तक दे रही है क्योंकि अकाली दल को कोई और नहीं बल्कि अंदरूनी फूट के कारण ही हार का सामना करना पड़ेगा। जालंधर की होट सीट पर 80 साल के बुजुर्ग को आगे तो कर दिया लेकिन अपने बंदे ही उन्हें पीछे धकेल रहे हैं। घमासान का नुकसान तो पार्टी को ही झेलना पड़ेगा। जालंधर में घमासान विधानसभा 2017 से शुरू हुआ है, जिसको अभी तक ठीक नहीं किया जा सका। हालांकि छोटे बादल सुखबीर सिंह भी जालंधर आ चुके हैं, वर्करों के साथ बातचीत भी कर चुके हैं। बावजूद इसके अभी तक सुधार दिखाई नहीं दे रहा।
दरअसल जब तक जिला प्रधान गुरचरण सिंह चन्नी थे, अकाली दल काफी तगड़ा था लेकिन उसके बाद जिला प्रधानगी की कमान आ गई एसजीपीसी मेंबर कुलवंत सिंह मन्नण के हाथ। अब मन्नण के सामने सरबजीत सिंह मक्कड़ जैसे धाकड़ आ गए तो वे बेचारे भी जैसे-तैसे काम चलाते आ रहे हैं। पार्टी की फूट कुछ दिन पहले भी सुखबीर की वर्कर मीटिंग में दिखाई दी। अब जहां कहीं भी प्रत्याशी अटवाल का प्रोग्राम होता है, वहां जिले के अकाली नेताओं की गिनती काफी कम रहती है। हर कोई ‘मैनूं की’ वाली स्थिति में है। पार्टी से वर्कर बेमुख हो रहे हैं जबकि अटवाल की मीटिंगों में भाजपाई जरूर दिखाई दे रहे हैं। अगर अब भी शहर के अकाली एक होकर अटवाल के साथ न चले तो कांग्रेस का ग्राफ 20 साल नहीं , और पांच साल के लिए बढ़ जाएगा।
दूसरी तरफ अगर अकाली दल मक्कड़ पर जिला प्रधानगी जैसा दांव खेल दे तो स्थिति मजबूत हो सकती है क्योंकि पार्टी के पास अभी फिलहाल मक्कड़ के अलावा दूसरा कोई तगड़ा नेता नहीं है।