बाहर धर्म कांटा, अंदर कथित अधर्म का काम… फर्जी बिलिंग और GST चोरी का खेल
विभागों की चुप्पी पर उठे सवाल, मिलीभगत करने वाले अफसरों पर भी गिर सकती है गाज
हरीश शर्मा (रोजाना भास्कर)
जालंधर : कंगनीवाल इंडस्ट्रियल एस्टेट, होशियारपुर रोड में स्क्रैप कारोबार की आड़ में कथित तौर पर चोरी के वाहनों को खरीदकर काटा जा रहा है। पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक कुछ संदिग्ध वाहन रात के समय यहां पहुंचते हैं और कथित तौर पर कुछ ही घंटों में उन्हें काटकर उनके हिस्से अलग कर दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, वाहनों की आवाजाही और उनके दस्तावेजों की जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक होशियारपुर-गढ़शंकर की तरफ से संदिग्ध वाहन यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि पुलिस और संबंधित विभाग चोरी के इस खेल का खुलासा क्यों नहीं कर रहा।
बाहर कंप्यूटर कांटा, अंदर फर्जी खेल
मामले में कंप्यूटर कांटे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कांटा पर्चियों और कथित बिलिंग के जरिए स्क्रैप की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। यदि किसी वाहन को स्क्रैप बताकर उसका लेन-देन दिखाया जा रहा है तो जांच में कांटा पर्ची, GST बिल, ई-वे बिल, वाहन नंबर, CCTV फुटेज और भुगतान के रिकॉर्ड का मिलान किया जाना चाहिए।
GST कानून के तहत वास्तविक आपूर्ति के बिना टैक्स इनवॉयस जारी करना और फर्जी दस्तावेजों के जरिए इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल करना गंभीर मामला है। CBIC ने फर्जी इनवॉयस से जुड़े मामलों में संबंधित प्रावधानों और कार्रवाई को स्पष्ट किया है।
चोरी का वाहन मिला तो मामला सिर्फ GST तक सीमित नहीं रहेगा
अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने चोरी की संपत्ति होने की जानकारी या ऐसा मानने का कारण होने के बावजूद उसे जानबूझकर खरीदा या अपने पास रखा, तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 317 के प्रावधान लागू हो सकते हैं। चोरी की संपत्ति को छिपाने या ठिकाने लगाने में जानबूझकर मदद करने पर भी इसी धारा में प्रावधान है। वाहन स्क्रैपिंग को लेकर केंद्र के नियम भी रिकॉर्ड और सत्यापन की व्यवस्था निर्धारित करते हैं। Registered Vehicle Scrapping Facility को वाहन को स्क्रैप करने से पहले Vahan रिकॉर्ड और चोरी हुए वाहनों के NCRB डेटाबेस से सत्यापन करना होता है।
विभागों की चुप्पी पर सवाल, जांच हुई तो खुल सकता है पूरा नेटवर्क
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ क्यों नहीं की जाती? और अगर आरोपों में सच्चाई है तो अब तक वाहनों के दस्तावेज, CCTV, कांटा पर्चियां, GST रिकॉर्ड और स्क्रैप खरीद का हिसाब क्यों नहीं खंगाला गया?
पुलिस, GST और परिवहन विभाग की संयुक्त जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि यहां आने वाले वाहनों का मालिक कौन था, वाहन किस रास्ते से पहुंचे, उनके दस्तावेज वैध थे या नहीं, स्क्रैप खरीद की एंट्री किस तरह हुई और काटे गए वाहनों के पुर्जे कहां भेजे गए।
मिलीभगत साबित हुई तो सिर्फ कारोबारी नहीं, जिम्मेदार अफसर भी सवालों के घेरे में आएंगे
अगर आला अधिकारी जांच करें तो अवैध गतिविधि की पुष्टि जरूर होगी। साथ ही यह भी सामने आएगा कि किन अधिकारियों ने जानबूझकर इस काले कारोबार का खुलासा क्यों नहीं किया। ऐसे में अब पुलिस, जीएसटी और परिवहन विभाग पर लोगों की नजर है कि चोरी के इस खेल का खुलासा कब होगा।













